भारत में खाद्य सुरक्षा का आर्थिक विश्लेषण

 

डाॅ. प्रति कुशवाहा

सहा.प्राध्यापक (वाणिज्य), सिन्धू कन्या महाविद्यालय, सतना (.प्र.)

ब्वततमेचवदकपदह ।नजीवत म्.उंपसरू

 

।ठैज्त्।ब्ज्रू

खाद्य सुरक्षा से तात्पर्य है सभी लोगों को सक्रिय और स्वस्थ जीवन बिताने के लिये कभी भी भोजन का अभाव होने देना। सर्वप्रथम ब्राजील के राष्ट्रपति लुला दॅ सिल्वा ने अपने यहाॅ खाद्य सुरक्षा का कानून लागू किया था। लूला के प्रयोग की सफलता ने सारी दुनिया के लिये सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में एक माॅडल देने का काम किया। हमारे देश के लिये भी खाद्यान्न सुरक्षा बेहद जरूरी है। क्योंकि कोई भी व्यक्ति बिना खाये जिंदा नहीं रह सकता है। हालांकि भारत ने 35 वर्ष पहले ही इस मामले में आत्म निर्भरता प्राप्त कर ली, इसके बावजूद आज भी देश में 35 प्रतिशत जनंसख्या खाद्यान्न के मामले में असुरक्षित है। देश में हरितक्रांति के फलस्वरूप उत्पादन कई गुणा बढ़ा है। इसके बावजूद जिस तरह हमारी आबादी बढ़ रही है उनके अनुरूप खाद्यान्न का उत्पादन नहीं बढ़ रहा है। हमे इस बात पर भी विचार करना होगा कि देश में हर तीसरा बच्चा कुपोषण का शिकार है और रोज लगभग 10 से 20 करोड़ लोग भूखे सोते हैं अप्रैल 2001 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने एक गोष्ठी में कहा था, कि ‘‘लोकतंत्र और भूख साथ-साथ नहीं चल सकते है’’ भूख और कुपोषण परहंगामारिपोर्ट जारी करते हुये प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह कहते है कि ‘‘हमारी जी.डी.पी. में पर्याप्त वृद्धि के बावजूद देश में कुपोषण का स्तर अस्वीकार्य रूप से ऊॅचा है यह बड़े शर्म की बात है’’

 

ज्ञम्ल्ॅव्त्क्ैरू .खाद्य सुरक्षा, ग्लोबल हंगर इण्डेक्श, खाद्यान्न उत्पादन, खाद्य असुरक्षा, सार्वजनिक वितरण प्रणाली

 

 

प्रस्तावनाः-

मानव की तीन मूलभूत आवश्यकताओं भोजन, कपड़ा और मकान में भोजन सबसे पहली और प्रमुख आवश्यकता है। पर्याप्त भोजन पाना प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है। विश्व की बुनियादी आवश्यकताओं में खाद्य संसाधन प्रमुख है। आज हमारे सामने ऐसी स्थिति है कि जहाॅ एक तरफ कुछ लोगों को खाने के लिये के बराबर भोजन मिल पाता है। वहीं दूसरी तरफ अन्य लोगों के पास जरूरत से ज्यादा भोजन है।

भारत की अर्थव्यवस्था मूलतः कृषि आधारित है। वैश्वीकरण और उदारीकरण के दौर में औद्योगिक क्षेत्र के आधुनिकीकरण तथा विकास पर विशेष बल दिया जा रहा है। और कृषि क्षेत्र पर नगण्य ध्यान दिया जा रहा है। यहाॅ पर उन बातों को नियंत्रित करने की जरूरत है जो औद्योगिक विकास को बढ़ाने के क्रम में कृषि क्षेत्र को क्षति पहुॅचाते हैं। खाने के लिये हमें अन्न चाहिये कि इस्पात और सोना इसलिये खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिये सभी वांछित प्रयास किये जाने चाहिये।

 

 

 

 

खाद्य सुरक्षा की अवधारणा (ब्वदबमचज िविवक ेमबनतपजल)-

खाद्य सुरक्षा की अवधारणा व्यक्ति के मूलभूत अधिकार को परिभाषित करती है। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपने शासन में खाद्य सुरक्षा के बारे में कहा था कि:-संतुलित आहार, पीने का शुद्व पानी, प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधा आदि सुविधायें देने का शारीरिक आर्थिक एवं सामाजिक मार्ग खाद्य सुरक्षा है।

 

1.      गुणवक्ता-किसी भी देश की समग्र जनसंख्याॅ को सिर्फ खाद्य की भौतिक उपलब्धि आवश्यक है बल्कि अच्छे गुणवत्ता वाले अन्न भी उपलब्ध होना चाहिये, जिससे वे पोषण सम्बन्धी आवश्यकता को पूरा कर सकें।

2.      क्रयशक्ति- सिर्फ पर्याप्त खाद्य उपलब्ध होना चाहिये बल्कि उनके पास पर्याप्त क्रय शक्ति भी होनी चाहिये ताकि वे अपनी जरूरतों के लिये खाद्य पदार्थ प्राप्त कर सकें।

3.      भण्डारणं पर्याप्त खाद्य का भण्डारण होना चाहिये।

4.      वितरण-सुसंगठित वितरण व्यवस्था होनी चाहिये।

 

अध्ययन का क्षेत्र एवं उद्देश्य (ैबवचम ंदक व्इरमबजपअम िजीम ैजनकल):-       

वर्तमान समय में यूॅ तो पूरे विश्व के लिये खाद्य सुरक्षा अत्यधिक महत्वपूर्ण है, किन्तु यहाॅ पर हमने पूरे भारत वर्ष को अध्ययन क्षेत्र के रूप में चुना है। भारत वर्ष में खाद्यान्न उत्पादन, जनसंख्या तथा कुपोषण की स्थिति का अध्ययन तथा विश्लेषण निम्म उद्देश्यो से किया गया है।

1.      खाद्य उत्पादन और खाद्य सुरक्षा की वर्तमान स्थिति का आॅकलन कर खाद्य सुरक्षा नीति का अध्ययन करना।

2.      बालकों में कुपोषण की स्थिति का अध्ययन कर उनके निराकरण का प्रयास करना।

3.      खाद्य सुरक्षा विधेयक की समस्याओं के निराकरण के लिये उपायों का अध्ययन करना।

 

विषय अध्ययन की आवश्यकता एवं महत्व (छममक ंदक ैपहदपपिबंदबम िजीम ेजनकल)-

भारत की जनसंख्याॅ निरन्तर बढ़ती जा रही है जबकि खाद्यान्नन उत्पादन में आनुपातिक रूप से कमी हो रही है। बालकों में कुपोषण बढ़ता जा रहा है। अतः यह एक चिंताजनक पहलू है कि आने वाले समय समय में खाद्य समस्या का निवारण कैसे किया जायेगा, लोगों को भरपेट भोजन कैसे उपलब्ध कराया जायेगा। और कुपोषण की स्थिति को कैसे नियंत्रित किया जायेगा। इन सब समस्याओं से निपटने हेतु भारत की क्या नीति हो? कौन से उपाय किये जा रहे हैं ? आदि सभी मुद्दों का अध्ययन और विश्लेषण होना बहुत जरूरी है।

 

शोध प्रविधि (त्मेमंबी डमजीवकवसवहल)

() उपकल्पना (भ्लचजवजीमेपे):-

1.      जनसंख्याॅ की तुलना में खाद्यान्न उत्पादन घटता जा रहा है।

2.      बालकों एवं महिलाओं में कुपोषण की स्थिति बढ़ रही है।

3.      खाद्यान्न की कीमतें बढ़ती जा रही हैं तथा आनुपातिक रूप से क्रय शक्ति कम हो रही है।

 

() शोध पत्र में प्रयुक्त तकनीक (ज्मबीदपुनमे नेमक पद तमेमंतबी चंचमत)-

इस शोध कार्य को प्राथमिक एवं द्वितीयक दोनों प्रकार के स्त्रोतों का प्रयोग कर पूर्ण किया गया है। प्राथमिक आॅकड़े पीड़ित लोगों से मुलाकात करके एकत्रित किये गये हैं। जबकि द्वितीयक आॅकड़े इस विषय पर प्रकाशित-अप्रकाशित पुस्तकों पत्र-पत्रिकाओं एवं शासकीय प्रतिवेदनों से प्राप्त किये गये हैं।

 

प्रयुक्त तकनीकी आधारभूत शब्दावली:-

खाद्य सुरक्षा:-

जब सभी लोगों को पूरे समय पर्याप्त सुरक्षित एवं पोषक खाद्य जो सक्रिय एवं स्वस्थ जीवन के लिये उनकी दैनिक आहार एवं खाद्य प्राथमिकताओं को पूरा करते हों, तक भौतिक, सामाजिक एवं आर्थिक पहुॅच खाद्य सुरक्षा कहलाता है।

 

खाद्य असुरक्षा:-

जब लोगों की खाद्य की उपर्युक्त परिभाषा तक पर्याप्त भौतिक, सामाजिक या आर्थिक पहुॅच नहीं हो तब खाद्य असुरक्षा की स्थिति उत्पन्न होती है।

 

ग्लोबल हंगर इण्डेक्स:-

ग्लोबल हंगर इण्डेक्स (विश्व व्यापी भूख सूचकांक) एक मल्टी नेशनल सांख्यिकीय उपकरण है जिसके द्वारा विश्व के विभिन्न देशों में भूख की दशा का संकेत मिलता है। इसके द्वारा वैश्विक स्तर पर भूख से लड़ने में मिली सफलता या असफलता का पता चलता है। अर्थात् यह पता चलता है कि वैश्विक स्तर पर भूख की समस्या से किस हद तक निपटा जा सका है और वर्तमान में इस दिशा में कितनी सफलता मिली है।

 

खाद्य उत्पादन:-

देश में एक वर्ष में उत्पन्न कुल खाद्यान्न की मात्रा।

 

सार्वजनिक वितरण प्रणाली:-

गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों को खाद्यन्न की न्यूनतम उपलब्धता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से केन्द्र सरकार ने वर्ष 1997 में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की शुरूआत की थी। इसको खाद्यान्न बाजार में मूल्यों में स्थिरता लाने की व्यवस्था के तौर पर शुरू किया गया था।

 

कुपोषण (डंसदनजतपजपवद):-

कुपोषण का अर्थ है कि आयु और शरीर के अनुरूप पर्याप्त शारीरिक विकास होना।

 

भारत में खाद्य समस्या (थ्ववक ेमबनतपजल चतवइसमउ पद प्दकपं)-

दुनिया भर में भुखमरी के शिकार लोगों की कुल आवादी का एक चैथाई लगभग 27 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा अकेले भारत मे ंरहता है। वैश्विक भूख सूचकांक (ग्लोबल हंगर इडेंक्स) पर 84 देशों में भारत, कई अत्यधिक गरीब अफ्रीका और एशियाई देशों से भी नीचे 67वें स्थान पर है।

 

पिछले दो 2 दशकों में तेज संवृद्धी दर के कारण जहाॅ भारत के जी.डी.पी. का आकार दुगना हो गया और प्रति व्यक्ति आय में तिगुनी वृद्धी दर्ज की गई उसी दौरान देश में गम्भीर भुखमरी के शिकार लोगों की तादाद में कमी आने की बजाय उनकी संख्या में 6.5 करोड़ की और बढोतरी हो गई है। हालात कितने गंभीर है इसका अदांजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि देश में कोई 48 फीसदी बच्चे और 40 फीसदी वयस्क भरपेट और पर्याप्त पोषण युक्त भोजन मिलने के कारण कुपोषण के शिकार है। ग्रामीण भारत में 23 करोड़ लोग अल्प पोषित है। ऐसा नहीं कि देश में अनाज की कमी है।

 

ग्रामीण क्षेत्रों में कृषक आज भी छोटी जोतो के कारण अपेक्षित खाद्यान्न का उत्पादन नहीं कर पाते है। यद्यपि भारत सहित पूरे विश्व में खाद्यान्न की कुल आवश्यक मात्रा उपलब्ध है परन्तु खाद्यान्न का असमान वितरण इस समस्या को जटिल बना देता है। यदि प्रति कैलोरी उपलब्धता की दृष्टि से देखा जाय तो आज विश्व के प्रत्येक व्यक्ति के लिये प्रति दिन 2500 कैलोरी के बराबर खद्यान उपलब्ध है। यह सामान्य औसत से 200 कैलोरी अधिक है। 2300 कैलोरी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा आदर्श स्थिति मानी गयी है। परन्तु एक व्यक्ति के लिये कम से कम 2200 कैलोरी ऊर्जा आवश्यक है। परन्तु समस्या असमान वितरण तथा लोगों में क्रयशक्ति के अभाव की है। भण्डारण की भी पर्याप्त व्यवस्था नहीं है।

 

कुपोषण या अल्प पोषण ;डंसदनजतपजपवदद्धः-

कुपोषण के मायने होते है आयु और शरीर के अनुरूप पर्याप्त शारीरिक विकास होना, एक स्तर के बाद यह मानसिक विकास की प्रक्रिया को भी अवरूद्ध करने लगता है। जन्म से लेकर 5 वर्ष तक की आयु के बच्चों को भोजन के जरिये पर्याप्त पोषण आहार मिलने के कारण उनमें कुपोषण की समस्या जन्म ले लेती है। इसके कारण प्रतिरोधी क्षमता कम होने से छोटी-छोटी बीमारियाँ उनकी मृत्यु का कारण बनती है। अतः कुपोषण की स्थिति तब पैदा होती है जब किसी व्यक्ति की कैलोरी लेने की क्षमतान्यूनतम आहार ऊर्जा आवश्यकतासे कम होता है।

 

हाल मंे दिनांक 09.01.2012 को प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने भूख और कुपोषण पर कई देशों के सांसदों और समाज के विभिन्न क्षेत्रों की हस्तियों की संस्था ‘‘हंगामा’’ (हंगर एड मालन्यूट्रीशन) रिपोर्ट जारी करते हुए बताया कि दुनिया से कुपोषण का शिकार हर तीसरा बच्चा भारतीय है। 42 फीसदी बच्चों का औसत वजन से कम है और 60 फीसदी बच्चो का कद औसत से कम है इन त्रासद आंकड़ो की रिपोर्ट जारी करते समय प्रधानमंत्री ने इस स्थिति को शर्मनाक और अस्वीकार्य करार दिया है।

 

 

मुस्लिम परिवार, अनुसूचित जाति जनजाति के बच्चों में पोषण स्तर सबसे खराब पाया गया। कम शैक्षणिक स्तर वाली माताओ के बच्चो में दुर्बल बौने बच्चों की संख्या सबसे ज्यादा पाई गई।

 

 

 

कुपोषण में वृद्धि के कारण:-

भूखे लोंगों की संख्या वृद्धि के लिये कई कारण उत्तरदायी है।

1.      गरीबो देश की आय में जबरदस्त कमी आयी है। इससे लोगों के उपभोग स्तर में कमी आयी। आय की कमी की समस्या झेल रहे देश में खाद्यान्नों के बढ़ते मूल्य ने संकट को और गहरा कर दिया। अब कम आय के कारण लोंग पर्याप्त खाद्यान्न खरीदने में असमर्थ होने लगें है।

2.     

3.      चिंता का दूसरा क्षेत्र खाद्यान्न के प्रयोग को लेकर है। एक रिर्पोट के मुताबिक वर्तमान में कुल खाद्यान्न उत्पादन का केवल 50 प्रतिशत ही प्रत्यक्ष मानव उपभोग हो रहा है। शेष खाद्यान्न का उपयोग कहीं और हो रहा हे। जैसे उभरते हुये अर्थ व्यवस्थाओं में मांस के बढ़ते उपभोग को देखते हुये इनकी मांग पूरी करने के लिये खाद्यान्न उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा जानवरों के भोजन के रूप में प्रयोग किया जा रहा है। इसके अलावा ऊर्जा की बढ़ती माॅग को पूरा करने के लिये जैवईधन उत्पादन हेतु कृषि उत्पाद पर बल दिया जाने लगा है।

 

 

 

 

आकड़ों का विश्लेषण तथा व्याख्या ;क्ंजं ंदंसलेपे ंदक पदजमतचतमजंजपवदद्धः-

उपरोक्त तालिका से यह स्पष्ट है कि देश में खाद्यान्न का उत्पादन प्रतिवर्ष बढ़ रहा है। लेकिन जनसंख्या की वृद्धि के अनुपात में खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धी नहीं हो रही है। इसलिये बढ़ती आबादी और कम उत्पाकता की समस्या बढ़ती जा रही है। अतः हमें खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धी करने के प्रयास करना चाहिये। खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने का सबसे बड़ा स्त्रोत कृषि है। दूसरी बात यह देखने को मिल रही है। कि प्रति वर्ष खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धी के बाद भी लगभग 48 प्रतिशत बच्चे और 40 प्रतिशत व्यस्क भरपेट और पर्याप्त पोषण युक्त भोजन मिलने के कारण कुपोषण के शिकार है इसका मुख्य कारण खाद्यान्न की कमी नहीं बल्कि खाद्यान्न का असमान वितरण है। तीसरी बात सैकड़ांे टन खाद्यान्न भण्डारण सुविधा की कमी के कारण खुले में पड़ा-पड़ा सड़ जाता है इससे स्पष्ट है कि हमारे पास भण्डारण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है।

 

 

 

उत्पादन घटने (खाद्य समस्या) के प्रमुख कारण ;त्मंेवद जव समेे चतवकनबजपवदद्धः-

1.      विश्व बैंक की माने तो सन् 2030 तक खाद्यान्न की वैश्विक मांग दुगनी हो जायेगी। जाहिर है कि भारत में भी खाद्यान्न की मांग दुगनी हो जायेगी। लेकिन आज जिस प्रकार का पर्यावरणीय असंतुलन पैदा हो रहा है उससे तो खाद्यान्न उत्पादन के घटने के संकेत मिलता है जैसा कि निम्न तालिका में दर्शाया गया है।

 

 

2.      बिना गोबर की खाद् दिये लगातार जैविक खादों का प्रयोग होता रहा है। जिससे उर्वरा शक्ति कम होती जा रही है। खेतों के मशीनीकर के चलते जोत कार्यो के लिये बैलो का इस्तेमाल नहीं कि बराबर रह गया है। इन जानवरो के अभाव के चलते गोबर खाद्य की उपलब्धता प्राय समाप्त सी हो गयी है।

3.      जहाॅ  कृषि कार्य मूलतः मशीन आधारित है वहाॅ बिजली की अनियमित पूर्ति एवं पेट्रोल, डीजल की समय पर अनुपलब्धता ने कृषि भूमि की जुताई, सिंचाई तथा फसलों की कटाई में काफी बाधायें पहुॅचाई है।

4.      ऊॅची दर पर मजदूरी देने के बावजूद भी कृषि कामगारों की समय पर पर्याप्त उपलब्धता नहीं हो पाती, क्योंकि लोग ग्रामीण क्षेत्रों से शहर की ओर पलायन कर रहें है।

5.      समुचित सिंचाई सुविधाओं के अभाव में भारतीय कृषि वर्षा जल पर निर्भर करती है जबकि वर्षा का नियत समय पर और पर्याप्त मात्रा में होना निश्चित नहीं होता।

6.      कृषि कार्यो के लिये आसानी से और समय जर बैंकों से कृषि ऋण प्राप्त नहीं होते।

 

चुनौतियाँ ;ब्ींससमदहमेद्ध-

1.      खाद्य सुरक्षा को लागू करने की पहली चुनौती है कि गरीबी का सही और सटीक आकलन

2.      दूसरी चुनौती यह है कि कानून का जरूरत के मुताबिक उत्पादन केसे बढ़ाया जाय। एक अनुमान के मुताबिक वर्तमान में हमारा उत्पादन 245 मिलियन टन के आसपास है जबकि 2020 तथा 281 मिलियन टन की दरकार इन देश को होगी। इसके लिये आवश्यक है कि प्रति हेक्टेयर उत्पादकता बढ़ाई जाय।

3.      तीसरी चुनौती खाद्यान्न के रखरखाव के लिये भण्डारण की पर्याप्त व्यवस्था की जाय। भण्डारण के अभाव के हजारों करोड़ का राशन हर साल खराब हो जाता है।

4.      चैथी चुनौती है वितरण प्रणाली को दुरूस्त करने की सरकार का आर्थिक समीक्षा के मुताबिक 51 फीसदी पी.डी.एस. था खाद्यान्न काले बाजार में बिक जाता है। इसका मतलब राज्य सरकारों कालाबाजारी रोकने में नाकामयाब रहीं है।

 

विश्लेषण से प्राप्त निष्कर्ष (थ्पदकपदहे तिवउ ।दंसलेपे)-

1.      विश्व के विकासशील देशो में खाद्यान्न समस्या का मुख्य कारण जनसंख्या विस्फोट भारत तथा चीन विश्व के सर्वाधिक खाद्यान्न उत्पादक देश है। परन्तु यहाॅ विश्व की 38 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है। इस कारण खाद्यान्न जनसंख्या अनुपात में असंतुलन बना रहता है। देश में प्रति हेक्टेयर उत्पादन काफी कम है तथा भूमि पर जनसंख्या का अत्यधिक दबाव होने के कारण किसी विशेष क्षेत्र के लोगों की आवश्यकता पूरी नहीं हो पाती है। जिससे खाद्य समस्या उत्पन्न हो जाती है।

2.      विकासशील देशों में कृषि में विविधता का भी अभाव है। प्रायः अधिकांश देशों में एक फसली संयोजन पाया जाता है। जिसमें उत्पादन कम होता है। फलतः खाद्यान्न की समस्या उत्पन्न हो जाती है।

3.      कृषि में आधुनिक तकनीक का प्रयोग नहीं करने से भी उत्पादन कम होता है।

4.      विकासशील देशों में परम्परागत खेतो में उपयोग से भी पैदावार कम हो जाती है।

5.      खाद्य समस्या का एक प्रमुख कारण वितरण सम्बन्धी समानता भी है।

 

राष्ट्रीय स्तर पर खाद्य सुरक्षा की दिशा में सम्यक विश्लेषण किया जाना चाहिए। यथाः

() पूरे देश में खाद्यान्न उत्पादन क्षेत्रों की पहचान की जानी चाहिए और उन्हें चिन्हित कर दिया जाना चाहिए और खाद्य सुरक्षा के हित में कृषि उत्पादो में वृद्धि को राष्ट्रीय स्तर पर सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

()    कृषि उपज का उपयुक्त मूल्य मिलना चाहिए ताकि कृषि कार्य में लगे लोगों को अपने जीवन स्तर को मार्यादापूर्ण स्थिति में बनाने रखने में सुविधा प्राप्त हो।

सुझाव ;ैनहहमेजपवदद्धः-

1.      सरकार 2011-12 में कृषि सेक्टर में लगभग 225 अरब रू. का निवेश करने जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को सब्सिडी और न्यूनतम मजदूरी देने के बजाय खाद्य उत्पादकता बढ़ाने और नवप्रवर्तन ;पददवअंजपवदद्ध पर जोर देना चाहिए। सरकार को स्वयं डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क में सुधार करना चाहिए। तभी किसानों और उपभोक्ताओं को सरकार के बढ़ते निवेश से फायदा होगा।

2.      जब तक देश से कुपोषण खत्म हो जाये तब तक खाद्यान्न के निर्यात पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए।

3.      जैव ईधन और शराब के उत्पादन में अनाजों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया जाना आवश्यक है।

4.      विश्व में खाद्य सुरक्षा के लिये जनसंख्या पर नियंत्रण आवश्यक है। जनसंख्या की वृद्धि सम्पूर्ण देश में खाद्यान्न उत्पादन की वृद्धि दर से अधिक है। दोनो में अन्तर होने के कारण खाद्य समस्या उत्पन्न होना स्वभाविक है अतः आवश्यक है कि लोगों को भरपेट भोजन की सुरक्षा हेतु जनसंख्या पर नियंत्रण लगाया जाय।

5.      खाद्यान्नो का उत्पादन बढ़ाने के लिये नई भूमि को कृषि के अन्तर्गत लाना चाहिए।

6.      खाद्य सुरक्षा के लिये आवश्यक है कि खाद्यान्नो की क्षति को रोका जाय। भारत में कुल क्षति कुल पैदावार की 3.31 प्रतिशत होती है। इसके लिये भण्डारण की समुचित व्यवस्था की जानी चाहिए। जब तक भण्डारण की पर्याप्त व्यवस्था हो तब तक सरकारी गोदामों में क्षमता से अधिक पड़े अनाज को गरीबों में बाॅट दिया जाए।

7.      सिंचित क्षेत्र की वृद्धि दर को दुगना करना चाहिए।

8.      निम्न स्तरीय भूमि का पुर्नरूधार करना तथा मृदा गुणवत्ता पर ध्यान देना चाहिए।

9.      पशुपालन, मत्स्य पालन को बढ़ावा देना चाहिए।

10.     खाद्यान्न की सुलभता उसके मूल्य और लोगो के आय पर निर्भर करती है। खाद्यान्न की कीमत कम रखने और कृषि आय ठीक-ठाक बनाये रखने के लिये उत्पादन की इकाई लागत में कमी लानी होगी।

11.     सन् 2050 तक डेढ़ अरब अतिरिक्त लोगों का पेट भरने के लिये जो अतिरिक्त खाद्यान्न की आवश्यकता होगी उसके लिये जल सुधार आवश्यक है। जल प्रबन्धन की स्थिति में सुधार किये बिना देश में खाद्यान्न संकट उत्पन्न हो सकता है। अतः जल स्त्रोतो पर पहला हक कृषि का हो।

12.     विगत 40 वर्षो में भूखे लोगों की संख्या 8 करोड़ से अधिक बने रहना हमारी मौजूदा खाद्य सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरी का द्योतक है। भूख से निपटने के लिये अल्पकालिक  तौर पर खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम को इस तरह व्यवस्थित किया जाना चाहिए की उसकी पहॅुच सर्वाधित जरूरतमंदो तक हो सके। साथ ही छोटे एवं सीमांत किसानों को कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिये अनिवार्य उपकरण एवं प्रौद्योगिकी की उपलब्धता भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

13.     लाखो टन खाद्यान्न खुले में पड़ा-पड़ा सड़ जाता है। इसके लिये हमें भण्डारण की सुविधायें बढ़ानी होगी।

14.     सरकार की आर्थिक समीक्षा के मुताबित 51 प्रतिशत जनवितरण प्रणाली का खाद्यान्न काले बाजार में बिक जाता है। अतः हमें अपनी सार्वजनिक वितरण प्रणाली को भी मजबूत बनाना होगा।

15.     इनके अतिरिक्त किसी अकस्मिक संकट से निपटने के लिये खाद्यान्नों का बफर स्टाॅक होना भी अत्यंत आवश्यक है।

 

निष्कर्ष:-

यदि हमें अपने उद्देश्य ‘‘सभी के लिये भोजन’’ में सफल होना है तो समाज के सभी क्षेत्रों को एकजुट होकर कार्य करना होगा। तथा ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम’’ की नीति अपनानी होगी। यह भी ध्यान रखना होगा कि सिर्फ कानून बनाने से भूखमरी समाप्त नहीं होगी। जैसा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हंगामा रिर्पोट प्रस्तुत करते हुये कहा कि ‘‘सारा काम सरकार नहीं कर सकती इसलिये समाज को भी अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिये आगे आना चाहिए। सारे धर्मो में गरीबो की मदद का प्रावधान है। गरीबों की मदद को पुण्य से जोड़ा गया है। पुण्य पर हम लोग थोड़ा ध्यान देगें तो कुपोषण की समस्या का काफी हद तक समाधान हो जायेगा।’’ आगे वे कहते है कि ‘‘हमारा विश्वास है कि माॅ की शिक्षा का स्तर, आर्थिक स्थिति, साफ-सफाई, परिवार और समाज में महिलाओं का दर्जा और स्तनपान आदि बच्चो के पोषण को प्रभावित करते है।’’

 

 

संदर्भ:-

1.      दत्त एवं सुन्दरम्, भारतीय अर्थव्यवस्था,, 2011

2.      डाॅ0 विजय कवि मण्डन, कृषि अर्थशास्त्र , 2010

3.      मिश्र एवं पुरी, भारतीय अर्थ व्यवस्था, 2011

4.      अर्थव्यवस्था परिदृश्य, अप्रैल 2008

5.      समसामयिक अवलोकन, धनकर प्रकाशन प्रभात नगर मेरठ, वार्षिकांक करेंट अफेयर 2012

6.      इण्डिया इकोनाॅमिक टाॅइम्स, अगस्त 2011

7.      योजना,  2011 आर.के. पुरम् नईदिल्ली

8.      सिविल सर्विसेस क्राॅनिकल, दिसम्बर 2009 डाॅ. मुखर्जी नगर नई दिल्ली

9.      दैनिक जागरण, 11.01.2012 एवं 17.01.2012 रीवा से प्रकाशित

10.     स्टार समाचार, 17.01.2012 सतना से प्रकाशित

 

 

 

 

 

Received on 07.09.2018                Modified on 19.09.2018

Accepted on 28.09.2018            © A&V Publications All right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2018; 6(3):305-310.

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